May 17, 2012

tHEn AnD nOW







AIM IN LIFE








Apr 13, 2012

जापान में संस्कृत परम्परा


जापान देश में पिछली चौदह शताब्दियों से संस्कृत-अध्ययन की अखण्ड परम्परा चली
आ रही है। प्रो. हाजी-मे-नाका-मुरा के अनुसार तो भारत को छोड़कर संसार में सबसे
अधिक संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन जापान में ही होता रहा है और एक बड़ी संख्या
में वहां के विद्यार्थी संस्कृत पढ़ते रहे हैं। भारत के विश्वविद्यालयों में
भारतीय दर्शन का विभाग सन्‌ १९१७ में चालू हुआ, जबकि जापान के टोकियो
विश्वविद्यालय में यह विभाग सन्‌ १९०४ में ही आरम्भ हो चुका था।**पिछली
शताब्दी में यूरोप के अनेक विद्वान काल-कवलित हुए संस्कृत वाङ्मय की खोज में
लग गये। इंग्लैंड के सर विलियम जोन्स, फ्रांस के प्रो. सिल्वांलेवी, जर्मन
विद्वान मैक्सम्यूलर, हंगरी के चोमाखोरेशी, हालैण्ड के प्रो. एच. कर्ण और
प्रो. सेदेस आदि विद्वानों ने भारत, तिब्बत, चीन, इण्डोनेशिया आदि की संस्कृत
पाण्डुलिपियों तथा संस्कृत से अनूदित ग्रन्थों की खोज की। सहस्रशः ऐसे
ग्रन्थों का पता चला जो विदेशी आक्रमणों के कारण भारत में नष्ट हो चुके थे। इन
संस्कृत एवं संस्कृत से अनूदित ग्रन्थों का उद्धार और सम्पादन संस्कृत जगत्‌
के लिये एक बड़ी चुनौती रही है। इस दिशा में जितना भी कार्य हुआ है उसका
अधिकांश श्रेय यूरोप के संस्कृत विद्वानों को ही जाता है। दुर्भाग्य से भारत
अभी इस क्षेत्र में बहुत पीछे है। मध्य पूर्वी एशिया में हजारों संस्कृत
ग्रन्थ और ग्रन्थों के खण्ड संग्रहालयों में, पुस्तकालयों में अथवा भूमि के
नीचे सोये पड़े हैं और उनमें सोया पड़ा है भारत के सांस्कृतिक अभ्युदय का
इतिहास। अपनी मूक वाणी में वे पुकार रहे हैं ‘को माम्‌ उद्धरिष्यति' शायद कोई
नूतन कुमरिल भट्ट इस पुकार को सुने।**सन्‌ १८८० में जापान में बर्तानिया के
दूतावास के एक अधिकारी अनैस्ट-सेटोअ को जापान की १८वीं शती के महानतम संस्कृत
विद्वान ऋषिवर ‘जी-उन्‌-सोंजा' द्वारा लिखे गये एक हजार ग्रन्थों का पता चला।
उन्हीं दिनों बर्तानिया में ऋग्वेद का प्रकाशन हुआ था। अनैस्ट-सैटोअ ने जापान
में ओसाका द्वीप के गुह्य सरस्वती मंदिर ‘‘को-की-जी' के अध्यक्ष भिक्षु
‘काईशिन्‌' को वेद का सैट दिया और भिक्षु ‘काईशिन्‌' से मुनिवर ‘जी-उन-सोंजा'
के नब्बे ग्रन्थ प्राप्त किये। संस्कृत के इन नब्बे ग्रन्थों से यूरोप के
विद्वानों में ‘को-की-जी' के सरस्वती मंदिर और मुनि ‘जी-उन-सोंजा' की धूम मच
गयी। उन संस्कृत ग्रन्थों में से ‘उष्णीय विजया ण् धारिणी', ‘वज्रछेदिका' और
‘सद्धर्म-पुण्डरीक' का सम्पादन एवं प्रकाशन किया गया। फ्रांस के विख्यात
भारतीयविद्याविशेषज्ञ प्रो. सिल्वांलेवी भी जापान में संस्कृत-अध्ययन के
इतिहास की खोज करने लगे।**जापान के आचार्य ककुबन (१०१५-११४८ई.) ने बीजाक्षर अ
को देवता मानकर (अक्षराणामकारोह्ढस्मि-गीता) उसे अष्टदल कमल पर आसीन तथा उस
कमल को भी वज्र पर आधारित माना है। धर्म को शक्ति का आधार मिले तभी धर्म
प्रभावी होगा। ‘शिंगोन' अर्थात्‌ सत्यवाक्‌ नाम दिया गया। अनेक मंदिर बनाये
गये एवं संस्कृत ग्रन्थों के विनय अवदान सूत्र ग्रन्थों के अनुवाद होने लगे।
किन्तु मंत्रों का महत्त्व अर्थों में ही नहीं बल्कि उच्चारणों में भी है और
चीनी लिपि उच्चारण के लिये समर्थ नहीं है तो भारत की लिपि का संस्कृत के मंत्र
लिखने के लिये प्रयोग किया गया। इस लिपि को सिद्धम्‌ कहा गया। ११वीं शती में
ईरानी यात्री अल्बेरूनी ने भी अपने यात्रा-वृत्तान्त में लिखा कि भारत में
सिद्धम्‌ लिपि का प्रचार है। कोबोदाईशी स्वयं सिद्धम्‌ के अच्छे लेखक थे।
जापान में सिद्धम्‌ लिखना एक कला बन गयी, साधना बन गयी, साधना का मापदण्ड बन
गयी। और आज तक यह स्थिति है।**चीन और जापान में ‘काञ्‌जी' लिपि में लिखा जाता
है जो कि चित्र लिपि है ‘कोबोदाईशी' ने ध्वनियों को प्रकट करने के लिये नयी
लिपि का आविष्कार किया जिसे काना कहते हैं। यह लिपि उन्होंने संस्कृत वर्णमाला
के आधार पर बनायी। कोबोदाईशी से भी पहले सन्‌ ५९३ में राजकुमार ‘शोतोकु' ने
जापान का राज्यभार सम्भाला। ‘शोतोकु' अपने महान्‌ आदर्शों एवं धर्मप्रचार के
कारण जापान के अशोक कहलाये। ईसा की छठी शताब्दी में शोतोकु ने जापान का १७
सूत्री संविधान बनाया जो कि भगवान्‌ बुद्ध के ‘बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय'
सिद्धान्त पर आधारित था। सम्भवतः यह संसार का सबसे पहला संविधान है जो कि
जापान के होर्यूजी मन्दिर के संग्रहालय में सुरक्षित है। संविधान के अवसर पर
भारत से संस्कृत ग्रन्थ ‘उष्णीशविजयाधारिणी' मंगवा कर उसका पाठ किया। यह
संस्कृत धारिणी भी ‘होर्यूजी' मन्दिर में रखी है। किन्तु वर्ष में एक बार ही
दर्शनार्थ बाहर निकाली जाती है। यह ग्रन्थ सम्भवतः संस्कृत की प्राचीनतम
पाण्डुलिपि हो। संस्कृत की अधिक प्राचीन पाण्डुलिपियां भारत में नहीं, जापान
से मिली हैं। भारत में १० शताब्दी तक की ही पाण्डुलिपियां हैं।****जबकि जापान
में छठी शताब्दी की भी पाण्डुलिपियां मिलती हैं। राजकुमार शोतोकु ताईशी ने
‘सद्धर्म पुण्डरीक सूत्र' ‘श्रीमाला देवी सिंह नादसूत्र' और ‘विमजकीर्ति
निर्देशसूत्र' पर भी भाष्य लिखे। कुछ वर्षों के पश्चात्‌ जापान सम्राट ‘शोमू'
ने तोदाईजी के मन्दिर के उद्घाटन के लिये भारतीय आचार्य बोधिसेन को बुलाने के
लिये अधिकारियों का एक दल चीन भेजा। इस दल की प्रार्थना को स्वीकार करके
भारद्वाज ब्राह्मण आचार्य बोधिसेन ने १३ दिसम्बर सन्‌ ७३० ई. को जापान के लिये
प्रस्थान किया। इनके साथ वियतनामी भिक्षु फुचिये और चीनी भिक्षु ‘ताओ सुआन' भी
थे। मार्ग कठिनाइयों से भरा था, किन्तु तांत्रिक आचार्य बोधिसेन के प्रभाव से
समुद्र शांत हुआ, यात्रा निर्बाध रही। नारा नगर के तोदाईजी के बड़े मन्दिर का
उद्घाटन और बुद्ध की विशाल प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा आचार्य बोधिसेन के
कर-कमलों द्वारा समपन्न हुई। भगवान बुद्ध की यह प्रतिमा अपने बृहत्‌ आकार के
कारण ‘दाईबुल्सु'? के नाम से प्रसिद्ध है। दाई अर्थात्‌ बड़ा, बुत्सु? अर्थात्‌
बुद्ध। महान्‌ बुद्ध। आचार्य बोधिसेन का जापान के सांस्कृतिक जीवन पर व्यापक
प्रभाव पड़ा।**जापानी नृत्य तथा संगीत जिसे ‘बुंगाकु' तथा ‘गगाकु' कहते हैं,
भारतीय ही हैं जो कि १३०० वर्ष पूर्व आचार्य बोधिसेन द्वारा जापान में प्रचलित
हुआ। अनेक संस्कृत कथाएं भी जापान की निधि बन गयीं। जैसे महाभारत में
ऋष्यश्रृंग का राजा लोमपाद की पुत्री शान्ता से परिणय की कथा जापान में बहुत
प्रचलित हुई। जापानी काबुकी में ‘नरुकामी' का कथानक इसी कथा पर आधारित है।**आधुनिक
युग में जापान के विद्वान संस्कृत की बड़ी सेवा कर रहे हैं। उन्होंने संस्कृत
के अनेक ऐसे ग्रन्थों का उद्धार किया है जिनके केवल अनुवाद ही चीनी तथा
तिब्बती भाषा में मिलते हैं। जापान में शिक्षा का माध्यम जापानी होने के कारण
जापानी विद्वानों की संस्कृत सेवा की जानकारी बाहर के देशों में बहुत कम हो
पायी। जापान में संस्कृत पुण्यभाषा के रूप में मानी जाती है। मध्ययुग में लड़ाई
से पहले योद्धा अपने कपड़ों पर संस्कृत के बीजाक्षर लिखवाकर युद्ध में जाया
करते थे। मृतकों की समाधियों पर संस्कृत मंत्र ‘ओं आविर हूं खं' और ‘ओं
स्वाहा' के मंत्र लिखे रहते हैं। जापान के अनेक मन्दिरों में लिखे संस्कृत के
मंत्र किस भारतीय को मुग्ध न कर देंगे।*

Mar 22, 2012

Feb 10, 2012

जिंदगी तो ब्राह्मण जिया करते है ,
दिगजो को पछाड़ कर के राज किया करते है ,
कौन रखता है किसी के सर पे ताज ,
हम ब्राहमण तो अपना राज तिलक ,
स्वयं अपने रक्त से किया करते है ..!!!

Proud to be brahmin !!

जय श्री राम कृष्ण परशुराम ॐ

Feb 9, 2012

जैसे गाय का बछङा हज़ारोँ गायोँ के बीच अपनी मां को ढूँढ ही लेता है और उसी के पास जाता है,ऐसे ही मनुष्य के कर्म भी उसे ढूँढ ही लेते हैँ।कर्ता अपने कर्म का फल भोगे बिना कैसे रह सकता है" 

चाणक्य
"Just as a calf recognises his own mother amongst thousands of cows and goes to her only,so is the Karm of a person,how can doer escape his karm?"
Chaanakya
ॐॐ

The Big Question: Porn in Assembly? - Yahoo!

The Big Question: Porn in Assembly? - Yahoo!:

'via Blog this'